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लाटोंवाली से लकड़हारान तक: हरिद्वार के 10 मोहल्लों की अनसुनी कहानी

इन मोहल्लों के नाम महज पते नहीं हैं। इनके पीछे कारीगरों, कारोबारों, धार्मिक परंपराओं, बदलते शहर और पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं की कहानियां छिपी हैं

E Editorसत्यापित पत्रकार Editor 5 मिनट में पढ़ें
लाटोंवाली से लकड़हारान तक: हरिद्वार के 10 मोहल्लों की अनसुनी कहानी

हरिद्वार को जानना हो तो सिर्फ उसके बड़े-बड़े घाटों और मंदिरों को देखना काफी नहीं है। शहर की असली परतें उसकी उन गलियों में भी मिलती हैं, जहां रोजमर्रा की जिंदगी दशकों से अपने पुराने अंदाज में चलती आ रही है। हरिद्वार नगर निगम की 60-वार्ड सूची में दर्ज कई ऐसे मोहल्ले हैं, जिनके नाम आज भी स्थानीय पहचान का हिस्सा हैं, लेकिन उनके नाम के पीछे की कहानी बहुत कम लोगों को पता है। लाटोंवाली, कुम्हारगढ़, चौकबाजार, कस्सावान, नेलखुडान, पाण्डेवाला, चाकलान, लकड़हारान, घोसीयान और पांवधोई जैसे नाम अपने आप में एक सवाल खड़ा करते हैं कि इनके नाम आखिर पड़े कैसे?

हरिद्वार की इन्हीं गलियों में चलते हैं और जानते हैं इन नामों के पीछे छिपी कहानियों को:

1. लाटोंवाली: नाम के पीछे देवी की मान्यता

कनखल क्षेत्र में स्थित लाटोंवाली (नगर निगम वार्ड संख्या 27) का नाम सुनते ही सबसे पहला सवाल यही उठता है कि आखिर इसे लाटोंवाली क्यों कहा गया?

स्थानीय मान्यता इस नाम को देवी-पूजा से जोड़ती है। माता दुर्गा या वैष्णो देवी को उनके भक्त कई प्रेमपूर्ण नामों से पुकारते हैं, जिनमें से एक नाम "लाटोंवाली माता" (लटा/केश वाली देवी) है। बेली राम आश्रम चौक के आसपास की बस्ती में लंबे समय से रहने वाले लोग इस इलाके की अपनी अलग पहचान बताते हैं।

2. कुम्हारगढ़: मिट्टी के बर्तनों की पुरानी पहचान

हरिद्वार के पुराने हिस्से में मौजूद कुम्हारगढ़/कुम्हारगढा (वार्ड संख्या 29) का नाम अपने आप में बहुत कुछ कहता है।

स्थानीय विवरण इसे पारंपरिक रूप से कुम्हार समुदाय और मिट्टी के बर्तन बनाने के काम से जोड़ते हैं। नाम से भी यही संकेत मिलता है कि कभी यहां कुम्हारों की बड़ी मौजूदगी रही होगी। वह दौर अलग था जब घरों में मिट्टी के घड़े, चूल्हे और दूसरे बर्तन रोजमर्रा की जरूरत थे। लेकिन समय के साथ बाजार बदला, औद्योगिक उत्पादन बढ़ा और मिट्टी के पारंपरिक कारोबार के सामने नई चुनौतियां आईं। अब नई पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने अन्य रोजगार और औद्योगिक क्षेत्रों में नौकरियां अपना ली हैं।

3. चौकबाजार: पुरानी व्यापारिक धरोहर

चौकबाजार (वार्ड संख्या 30) का पुराना व्यापारिक महत्व रहा है। कपड़े, जूते, दवाइयां, चाय और छोटे कारोबार यहां की पहचान का हिस्सा रहे हैं। कई दुकानों के बारे में स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आती है कि वे एक से अधिक पीढ़ियों से चल रही हैं। हालांकि, अब सड़क चौड़ीकरण, आधुनिक रिटेल और ऑनलाइन खरीदारी के चलते बाजार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है।

4. कस्सावान: एक नाम, कई दावे

हर की पैड़ी के आसपास स्थित कस्सावान (वार्ड संख्या 41) नाम की उत्पत्ति को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। कुछ मान्यताएं इसे कपास (सूती वस्त्र/धागे) के व्यापार और कारीगरों से जोड़ती हैं, जबकि कुछ मौखिक इतिहासों में कसाब/कसाई (मांस व्यापार) शब्द के ऐतिहासिक अपभ्रंश का उल्लेख भी मिलता है। समय के साथ तीर्थयात्रियों की आवाजाही बढ़ने से यहां सेवा और व्यापारिक गतिविधियों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।

5. पाण्डेवाला: पीढ़ियों के वंशावली रिकॉर्ड

हरिद्वार की धार्मिक परंपराओं को समझने के लिए पाण्डेवाला (वार्ड संख्या 47) एक महत्वपूर्ण नाम है। हर की पैड़ी के निकट स्थित इस मोहल्ले की पहचान पंडा समाज और वंशावली (बही-खाते) संरक्षण से जुड़ी है। यहां पंडा परिवारों के पास तीर्थयात्रियों के परिवारों से जुड़ी कई पीढ़ियों की वंशावली के ऐतिहासिक रिकॉर्ड सुरक्षित हैं।

6. नेलखुडान (नीलखुदान): ऐतिहासिक कारीगरी का प्रतीक

ज्वालापुर/कनखल सीमा से सटे नीलखुदान (वार्ड संख्या 46) के नाम के पीछे रंगाई और नील (Indigo) के काम से जुड़ी ऐतिहासिक धारणाएं मानी जाती हैं। माना जाता है कि पुराने समय में वस्त्र रंगाई और नील की खड्डियों (खुदान) के काम से जुड़े कारीगरों के कारण इस स्थान का नाम नीलखुदान पड़ा।

7. चाकलान: नाम मौजूद, कहानी धुंधली

चाकलान/चाकलाना (वार्ड संख्या 48) के नाम की उत्पत्ति को लेकर तीन मुख्य ऐतिहासिक धारणाएं प्रचलित हैं:

  1. मुगल व ब्रिटिश काल में प्रशासनिक या राजस्व (Revenue) की सहूलियत के लिए बांटे गए क्षेत्रों को "चकला" कहा जाता था।
  2. कुम्हारों के 'चाक' या पत्थर/लकड़ी तराशने वाले कारीगरों की बहुलता का क्षेत्र होना।
  3. स्थानीय बोलचाल में 'चौकोर' या विशिष्ट चौड़े भूभाग को 'चाक' कहा जाना।

8. लकड़हारान: लकड़ी के कारोबार की याद

गौघाट के निकट स्थित लकड़हारान (वार्ड संख्या 49) का नाम सीधे तौर पर लकड़ी के पुराने बाजार और काष्ठ व्यवसाय (Wood Trade) की ओर इशारा करता है। आज यहाँ लकड़ी के साथ-साथ निर्माण सामग्री और टाइल्स आदि के आधुनिक कारोबार विकसित हो चुके हैं।

9. घोसीयान: समुदाय की ऐतिहासिक छाप

ज्वालापुर क्षेत्र का घोसीयान (वार्ड संख्या 51) अपने नाम में एक सामाजिक छाप रखता है। 'घोसी' (या घोषी) उत्तर भारत का एक पारंपरिक पशुपालक एवं गोपालक समुदाय है। भाषा-विज्ञान के अनुसार, उर्दू व फ़ारसी प्रभाव वाले क्षेत्रों में किसी वर्ग या समुदाय की बस्ती के नाम में 'आन' प्रत्यय (Suffix) जोड़ा जाता था (जैसे पठान से पठानोंवाली/पठानियान या घोसी से घोसीयान)।

10. पांवधोई: प्रवेश द्वार की पौराणिक व व्यवहारिक परंपरा

पांवधोई (वार्ड संख्या 43) की कहानी पैदल यात्रियों के दौर से जुड़ी है। लोक-परंपरा के अनुसार, मुख्य नगरी में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालु गंगा की उप-धारा या घाट पर अपनी यात्रा की थकान मिटाने और शुद्धि के लिए पांव धोते थे, जिसके कारण इस स्थान का नाम 'पांवधोई' पड़ा।

एक नाम, कई सवाल

इन मोहल्लों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनकी जानकारी केवल सरकारी कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय स्मृतियों और मौखिक परंपराओं में जिंदा है। जब अगली बार आप हरिद्वार की इन गलियों से गुजरें, तो किसी बुजुर्ग से एक सवाल जरूर पूछिए—"इस नाम के पीछे की कहानी क्या है?" क्योंकि शहर का वास्तविक इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों की यादों में बसता है।

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